रुद्रप्रयाग में धीरे-धीरे विलुप्त हो रही पारंपरिक “पठाल” के मकानों की पहचान……
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कभी पहाड़ की शान रहे पत्थर की स्लेट वाले घर अब बनते जा रहे अतीत की कहानी…
रुद्रप्रयाग। पहाड़ों की पहचान और पारंपरिक वास्तुकला की अनमोल धरोहर माने जाने वाले पठाल से बने मकान अब धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमटते जा रहे हैं। कभी गांव-गांव में नजर आने वाले ये खूबसूरत और मजबूत मकान आज आधुनिक निर्माण सामग्री और बदलती जीवनशैली के बीच अपनी पहचान खोते जा रहे हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में सदियों से प्रचलित इस निर्माण शैली में स्थानीय पत्थरों, लकड़ी और पठाल का उपयोग किया जाता था। इन मकानों की छतों पर बिछाए गए पठाल न केवल बेहद मजबूत होते थे, बल्कि बरसात, बर्फबारी और तेज हवाओं से घरों को सुरक्षित भी रखते थे। खास बात यह थी कि ये मकान प्राकृतिक रूप से तापमान को संतुलित रखते थे। सर्दियों में अंदर गर्माहट और गर्मियों में ठंडक का अहसास इनकी सबसे बड़ी विशेषता मानी जाती थी।
स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि एक समय ऐसा था जब पहाड़ों के लगभग हर गांव में इसी शैली के मकान देखने को मिलते थे। इन घरों की मजबूती और प्राकृतिक अनुकूलता के कारण ये दशकों तक बिना किसी बड़े नुकसान के खड़े रहते थे। साथ ही इनका रखरखाव भी अपेक्षाकृत आसान माना जाता था।
लेकिन बदलते समय के साथ अब सीमेंट, सरिया और कंक्रीट से बने आधुनिक मकानों का चलन तेजी से बढ़ गया है। तेज निर्माण प्रक्रिया, कम समय में तैयार होने वाले भवन और आधुनिक सुविधाओं के आकर्षण ने लोगों को पारंपरिक शैली से दूर कर दिया है। इसका परिणाम यह हुआ कि पठाल के मकान बनाने वाले कुशल कारीगरों की संख्या भी लगातार घटती जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक निर्माण तकनीक नहीं, बल्कि पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक ज्ञान का जीवंत उदाहरण है। यदि समय रहते इस कला के संरक्षण, प्रोत्साहन और नई पीढ़ी को इसके महत्व से परिचित कराने के प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में यह अनमोल विरासत पूरी तरह विलुप्त होने का खतरा पैदा हो सकता है। पठाल के ये मकान केवल पत्थरों से बनी इमारतें नहीं हैं, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, प्रकृति और पारंपरिक जीवनशैली का प्रतीक हैं, जिन्हें बचाना आज समय की बड़ी जरूरत बन गया है।