नीतीश कुमार का दिल्ली दरबार में दस्तक बिहार की राजनीति में नई करवट…..

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(लेखक – बिनोद कुमार सिंह)

भारतीय राजनीति में कुछ घटनाएँ केवल सत्ता परिवर्तन की खबर नहीं होतीं,बल्कि वे एक पूरे दौर के अंत और एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत देती हैं।बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार का राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल करना भी ऐसी ही एक घटनाक्रमःहै,जिसने बिहार की राजनीति पर पैनी पकड वालें राजनीतिक पंडिलों में हलचल पैदा कर दी है।लगभग दो दशकों से बिहार की सत्ता के केंद्र में रहे एक नेता का सक्रिय प्रशासनिक राजनीति से संसद भवन की ओर बढ़ना केवल एक व्यक्तिगत राजनीतिक निर्णय नहीं है,बल्कि यह बिहार की राजनीति ,सत्ता संरचना,गठबंधन राजनीति और राष्ट्रीय रणनीति से जुड़ा एक बड़ा राजनीतिक संकेत भी है।नीतीश कुमार लंबे समय से बिहार की राजनीति का पर्याय रहे हैं। लगभग पाँच दशकों से अधिक का उनका राजनीतिक जीवन भारतीय लोकतंत्र की अनेक परतों को अपने भीतर समेटे हुए है।उनका जन्म 1 मार्च 1951 को बिहार के नालंदा जिले के बख्तियारपुर में हुआ। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने राजनीति को अपना जीवन मार्ग बनाया।छात्र जीवन से ही वे राजनीति और समाजवादी विचारधारा से प्रेरित होकर उन्होंने लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से अपनी सक्रिय राजनीतिक यात्रा शुरू की।1974 के जेपी आंदोलन ने उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को दिशा दी और यही आंदोलन आगे चलकर उन्हें बिहार की मुख्यधारा की राजनीति में स्थापित करने का आधार बना। सर्व विदित रहें कि
नीतीश कुमार पहली बार वर्ष 1985 में बिहार विधानसभा के लिए चुने गए।इसके बाद उनका राजनीतिक कद धीरे-धीरे बढ़ता गया।वर्ष 1989 में वे पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए और संसद में उनकी सक्रियता ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में पहचान दिलाई। 1990 के दशक में वे केंद्र की राजनीति में एक प्रभावशाली नेता के रूप में उभरे और कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में उन्होंने रेल मंत्री, कृषि मंत्री और सतही परिवहन मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया।रेल मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल विशेष रूप से उल्लेख नीय रहा।वर्ष 1998 और 1999 के बीच तथा बाद में 2001 में उन्होंने रेल मंत्रालय का दायित्व संभाला। इसी दौरान बिहार के गयसाल रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने इस्तीफा देकर भारतीय राजनीति में एक अलग उदाहरण प्रस्तुत किया।यह कदम उनकी राजनीतिक शैली और जवाबदेही की भावना का प्रतीक माना गया।
बिहार की राजनीति में उनका निर्णायक उदय वर्ष 2005 में हुआ जब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन कर राज्य में सरकार बनाई।उस समय बिहार लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता और प्रशासनिक चुनौतियों से जूझ रहा था।नीतीश कुमार ने ‘सुशासन’ और विकास के एजेंडे के साथ सत्ता संभाली और राज्य की छवि बदलने का प्रयास किया।सड़कों के निर्माण,विद्यालयों में छात्राओं के लिए साइकिल योजना,महिला सशक्तिकरण और कानून व्यवस्था में सुधार जैसे कदमों ने उन्हें एक विकासवादी नेता की पहचान दी।
नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री के रूप में राजनीतिक सफर भी अपने आप में एक रिकॉर्ड है।वे बिहार के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेताओं में शामिल हैं। वर्ष 2000 में वे पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने, हालांकि उस समय वे बहुमत साबित नहीं कर पाए और उनका कार्यकाल केवल कुछ दिनों का रहा। इसके बाद वर्ष 2005 में वे पुनः मुख्यमंत्री बने और तब से लेकर अब तक वे लगभग लगातार बिहार की सत्ता के केंद्र में बने रहे। 2005, 2010, 2015, 2020 और 2024 के बाद के राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच वे कुल मिलाकर दस बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं।इस प्रकार लगभग बीस वर्षों से अधिक समय तक उन्होंने बिहार की राजनीति को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया है।
उनकी राजनीतिक यात्रा में कई उतार-चढ़ाव भी आए।उन्होंने समय-समय पर गठबंधन बदले और राजनीतिक समीकरणों को नए सिरे से गढ़ा।कभी वे भाजपा के साथ रहे,कभी राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के साथ महागठबंधन में शामिल हुए, लैकिन फिर दोबारा एनडीए के साथ लौट आए।यही कारण है कि उन्हें भारतीय राजनीति का एक अत्यंत व्यावहारिक और रणनीतिक नेता माना जाता है।अब जब उन्होंने राज्यसभा जाने का निर्णय लिया है,तो यह बिहार की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत माना जा रहा है।दो दशकों से अधिक समय तक राज्य की सत्ता के केंद्र में रहने के बाद उनका संसद की ओर बढ़ना केवल पद परिवर्तन नहीं बल्कि राजनीतिक भूमिका के विस्तार के रूप में भी देखा जा सकता है। उनके अनुसार संसदीय जीवन की शुरुआत से ही उनकी इच्छा थी कि वे संसद के दोनों सदनों के सदस्य बनें। इसी क्रम में अब वे राज्यसभा के माध्यम से राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाना चाहते हैं।इस निर्णय के साथ ही बिहार की राजनीति में कई सवाल खड़े हो गए हैं।सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी अब किसके हाथ में जाएगी। पिछले बीस वर्षों में बिहार की राजनीति का एक स्थायी तथ्य यह रहा है कि गठबंधन चाहे जो भी हो, मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अक्सर नीतीश कुमार ही दिखाई देते थे।ऐसे में उनके राज्यसभा जाने से सत्ता का नया समीकरण बनना लगभग तय माना जा रहा है।इस पूरे घटनाक्रम का राष्ट्रीय राजनीति से भी गहरा संबंध है।उनके नामांकन के समय केंद्रीय गृह मंत्री का पटना पहुँचना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि यह निर्णय केवल राज्य की राजनीति तक सीमित नहीं है। संभव है कि उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अधिक सक्रिय भूमिका देने की रणनीति के तहत यह कदम उठाया गया हो। संसद में उनकी उपस्थिति एनडीए के लिए एक अनुभवी और संतुलित नेतृत्व का प्रतीक बन सकती है।
विपक्षी दलों ने इस निर्णय पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल ने इसे जनता के जनादेश के साथ विश्वासघात बताया है।उनका तर्क है कि यदि जनता ने किसी नेता को मुख्यमंत्री के रूप में चुना है और वह अचानक राज्यसभा की ओर चला जाता है तो यह लोकतांत्रिक भावना के विपरीत है।वही दूसरी ओर एनडीए के नेता इसे नीतीश कुमार का व्यक्तिगत और स्वाभाविक निर्णय बता रहे हैं।राजनीतिक विश्लेषण की दृष्टि से देखा जाए तो इस निर्णय के कई संभावित परिणाम हो सकते हैं। यदि बिहार में नया नेतृत्व उभरता है तो राज्य की राजनीति में नई ऊर्जा और नई प्रतिस्पर्धा देखने को मिल सकती है।भाजपा और जेडीयू के बीच सत्ता संतुलन का नया समीकरण भी बन सकता है।वहीं विपक्ष इस मुद्दे को जनता के बीच एक राजनीतिक अवसर के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करेगा।यह भी स्पष्ट है कि नीतीश कुमार का प्रभाव अचानक समाप्त होने वाला नहीं है। उनका अनुभव, उनकी राजनीतिक समझ और प्रशासनिक क्षमता अभी भी बिहार की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। संभव है कि वे राज्यसभा में रहते हुए भी बिहार की राजनीति के मार्गदर्शक बने रहें और राज्य के विकास संबंधी निर्णयों पर उनका प्रभाव बना रहे।
समग्र रूप से देखा जाए तो नीतीश कुमार का राज्यसभा की ओर बढ़ना बिहार की राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है। लगभग पाँच दशक की सक्रिय राजनीति और दो दशकों की सत्ता के बाद उनका यह निर्णय एक नए राजनीतिक युग की शुरुआत का संकेत देता है।यह परिवर्तन बिहार की राजनीति को किस दिशा में ले जाएगा, यह आने वाला समय तय करेगा।इतना निश्चित है कि बिहार की राजनीति अब एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है;जहाँ पुराने अनुभव और नए नेतृत्व के बीच संतुलन स्थापित करना सबसे बड़ी चुनौती होगा। नीतीश कुमार का यह कदम आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति की दिशा और बिहार की सत्ता संरचना दोनों को प्रभावित कर सकता है।

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