-करार टीरि, लोकभाषा साहित्यिक समिति ने देहरादून में आयोजित किया गढ़वाली कविता विमर्श 

1 min read

Oplus_16908288

देहरादून। अमोलाज फेमली रेस्टोरेन्ट देहरादून में सौं-करार टीरि, लोकभाषा साहित्यिक समिति के संस्थापक अध्यक्ष अरविन्द ‘प्रकृति प्रेमी’ के दिशा निर्देशन में गढ़वाली कविता साहित्य में बेहतर रचनाशीलता के उद्देश्य से गढ़वाली कविता विमर्श की तीसरी संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस विमर्श का विषय-‘‘आजकल मैंन गढ़वाळि कविता मा क्या अनुभव करि? ’’ था। संगोष्ठी के बतौर मुख्य अतिथि कवि सुशील चन्द्रा और अध्यक्षता वरिष्ठ/ प्रसिद्ध साहित्यकार महाबीर रवांल्टा ने की। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाबीर रवांल्टा ने कहा कि, कविता साहित्य के लिए हमें लोक को नजदीक से समझना होगा तभी हम समाज को समझेंगे, उसके संघर्ष को जानना होगा। तभी हम अच्छा साहित्य लिख सकते हैं। पलायन को नई दृष्टि से देखने के लिए हमें मानसिक पलायन नहीं करना है। मुख्य अतिथि सुशील चन्द्रा ने कहा की कविता एक प्रसव पीड़ा की तरह ही होती है कविता तभी निकलती है जब इस प्रकार की भावों-विचारों की अनुभूति होती है। उन्होंने कवि के भोगता होने की ओर अपना इशारा किया। संस्था के संस्थापक अध्यक्ष अरविन्द ‘प्रकृति प्रेमी’ ने कहा कि, कविता में विचार हों तो संवेदना, भाव हो तों तार्किकता हो इस जटिलता को हमें समझना होगा और परिवर्तन के लिए वैज्ञानिकता का होना। हमें संरक्षणवादी कविता की दुनिया से आगे निकलने की आवश्यकता है और समसामयिकता में अपने समय को दर्ज करना, कवि कर्म की जिम्मेदारी है। सामाजिक चेतना को, अपने समय में फोटोग्राफी नहीं बल्कि कवि चि़त्रकारी करे। देश-दुन्या की कविता से, बड़े लेखकों को पढ़ने से ही यह समझना सरल है कि अच्छी रचनाएं कैसे लिखी जा सकती है? गीता गैरोला ने वर्तमान सामाजिक हलातों के बिगड़ते स्वरूप पर चिंता जताई, मनुष्यता, नशामुक्ति, सामाजिक बुराईयों पर सभी का ध्यान खींचा। शिवदयाल ‘शैलज’ ने कहा- भाषा की मौलिकता में शब्दों के प्रयोग पर चिंता जताई और गढ़वाली कविता में मौलिक शब्दों के कम प्रयोग होने से मिश्रित भाषा के कारण हमारी कविता हल्की पड़ रही है। सामजिक परिवर्तन के लिए जो काम पत्रकार कर रहे हैं वही कवि को भी करना चाहिए। कवि को सामाजिक जटिलता को पलटने की ताकत अपनी कविता में रखनी चाहिए। डाॅ0 सत्यानन्द बडोनी ने कविता में जन सरोकार, और स्वच्छ समाज, जन कल्याण की बात कही। कविता में मानकीकृत भाषा शब्द विपुल सम्पदा पर अपने सार्थक विचार रखे। महत्वपूर्ण सावल भी रेखांकित किए। रक्षा बौड़ाई ‘हिलांस’ ने कहा सामाजिक घटना, संघर्ष, मनुष्यता के लिए कविता में समाज की आवाज उठाने की बात करनी चाहिए। अपने समाज से बाहर की तरफ भी झांकना समाज के बदलते स्वरूप पर भी नजर रखनी चाहिए। सटीक बिम्ब और प्रतीक के प्रयोग, कविता की नई शाषा शैली को आवश्यक बताया। इससे ही विचार विस्तार होगा। अर्चना गौड़ ने सामाजिक विषय पर प्रयोगवादी, प्रगतिवादी रचना पुराने पैटर्न केा तोड़कर इससे हटकर नवीन लेखन का विचार रखा।
    साथ ही इस संगोष्ठी के द्वितीय चक्र में एक बेहतरीन कवि गोष्ठी भी हुई। जिसमें सुशील चन्द्रा ने मेरा गौं का लोग, शिवदयाल ‘शैलज’ ने गजल- कुंगळि जिकुड़ि मायादार कख रयान, गीता गैरोला ने कना गौं कुटुम बिगड्या? अरविन्द ‘प्रकृति प्रेमी ने द्वी बसंत, अर्चना गौड़ ने हम तैं ना दिखा, रक्षा बौड़ाई ‘हिलांस’ लोक तंत्र पर, महाबीर रवांल्टा ने सी कूण? डाॅ0 सत्यानन्द बडोनी ने इंसानी रंग,  एक से बढ़कर गहरी संवेदना, विचारों से समृद्ध रचनाएँ सुनाई। इस दौरान प्रत्येक कवि/कवयित्री की कविता पर समीक्षात्मक विचार विमर्श भी हुआ। कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए महाबीर रवांल्टा ने अरविन्द ‘प्रकृति प्रेमी’ के साहित्यिक कार्य की प्रशंसा भी की और सभी ने इस कार्यक्रम को गढ़वाली कविता साहित्य में बेहतर, नई दृष्टि की रचनाधर्मिता के लिए अच्छी पहल बताया। इस कविता विमर्श कार्यक्रम का सफल संचालन रक्षा बौड़ाई ‘हिलांस’ ने किया।
Copyright, Shikher Sandesh 2023 (Designed & Develope by Manish Naithani 9084358715) © All rights reserved. | Newsphere by AF themes.