पुस्तक समीक्षा:- पवन कुमार मैठानी

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वरिष्ठ पत्रकार विवेक शुक्ला जी की नयी पुस्तक 1947: बंटवारे के शेष सवाल, 1947 के विभाजन की त्रासदी, हमारी साझी तहज़ीब और उसके बाद उपजे अनसुलझे मानवीय प्रश्नों पर गहराई से विचार करती दिखाई देती है।

 

पुस्तक के एक चैप्टर में विवेक जी ने विभाजन के दौरान क्वेटा, बलूचिस्तान व लाहौर से दिल्ली आये उत्तराखण्डियों का भी जिक्र भी किया है। जिस पर इससे पूर्व शायद ही किसी ने लिखा हो।

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और स्तंभकार विवेक शुक्ला जी हिंदी पत्रकारिता की उन चुनिंदा हस्तियों में हैं जिन्होंने चार दशक से अधिक समय तक पत्रकारिता को केवल खबरों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इतिहास, समाज, संस्कृति और विशेष रूप से दिल्ली की बदलती पहचान को अपने लेखन का विषय बनाया। वे उन पत्रकारों में गिने जाते हैं जिनकी रिपोर्टिंग तथ्यों, शोध और ऐतिहासिक संदर्भों पर आधारित होती है।

विवेक जी का दिल्ली पर लिखना अपना प्रिय विषय रहा है। राजधानी के इतिहास, उसकी गलियों, इमारतों, बाज़ारों और सांस्कृतिक विरासत पर उनका शोधपरक लेखन उन्हें दिल्ली का गंभीर दस्तावेज़कार बनाता है। जिसे हम रोज नवभारत टाइम्स में पढते ही हैं। उनकी चर्चित पुस्तकों में “दिल्ली का पहला प्यार : कनॉट प्लेस” तथा “Gandhi’s Delhi” विशेष रूप से उल्लेखनीय रही हैं। इन पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने दिल्ली के अतीत और वर्तमान को आम पाठकों के सामने सरल, रोचक और प्रमाणिक शैली में प्रस्तुत किया है। पुस्तक को प्रवासी प्रेम पब्लिशिंग, भारत ने प्रकाशित किया है। पुस्तक में कुल 42 चैप्टर हैं। हर चैप्टर अपने में नयी जानकारी लिए हुए है। पुस्तक की कीमत Rs. 390/- है।

हिंदी पत्रकारिता में उनके दीर्घकालिक योगदान को देखते हुए वर्ष 2026 में उन्हें नई दुनिया फाउंडेशन मीडिया फॉर यूनिटी अवॉर्ड्स के अंतर्गत प्रतिष्ठित प्रभाष जोशी अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। यह सम्मान हिंदी पत्रकारिता में उनके उल्लेखनीय योगदान, जनसरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता और सकारात्मक पत्रकारिता के लिए प्रदान किया गया।

विवेक शुक्ला की पत्रकारिता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे इतिहास को वर्तमान से जोड़ते हैं। उनके लेख केवल सूचना नहीं देते, बल्कि पाठकों को उस दौर, उस समाज और उन परिस्थितियों से भी परिचित कराते हैं जिनसे आधुनिक भारत का निर्माण हुआ। यही कारण है कि मैं उन्हें एक ऐसे पत्रकार-लेखक के रूप में देखता जिनका लेखन समाचार से आगे बढ़कर सामाजिक स्मृति का हिस्सा बन जाता है। आजकल शुक्ला जी की नयी पुस्तक 1947 विभाजन के शेष सवाल को पढ रहा हूं, जैसे-जैसे पुस्तक को पढ़ता जा रहा हूं, पुस्तक के प्रति मेरी जिज्ञासा और बढ़ती जा रही है। यही लेखक का सबसे बड़ा गुण होता है कि वह पाठक के मन में पूरी पुस्तक को पढ़ने की जिज्ञासा उत्पन्न कर दे, उसमें शुक्ला जी अव्वल रहे। विवेक जी को बहुत-बहुत बधाई।

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