लोक-संस्कृति के आकाश में एक उज्ज्वल नक्षत्र थे – जीत सिंह नेगी…..
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उत्तराखण्ड लोक विरासत महान लोकगायक जीत सिंह नेगी….
लेख संकलन
(दिनेश ध्यानी वरिष्ठ साहित्यकार)
देश और समाज के इतिहास में समय-समय पर ऐसी विभूतियाँ जन्म लेती हैं, जो अपने युग की सीमाओं को लांघकर आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बन जाती हैं। वे केवल अपने क्षेत्र में कार्य नहीं करतीं, बल्कि एक सांस्कृतिक धरोहर का निर्माण करती हैं। उत्तराखण्ड की लोक-संस्कृति के आकाश में ऐसा ही एक उज्ज्वल नक्षत्र थे – जीत सिंह नेगी।
उन्हें गढ़वाली संगीत जगत में स्नेहपूर्वक “गढ़वाली सहगल” भी कहा जाता था। यह उपमा उन्हें उनके मधुर, भावपूर्ण और प्रभावशाली गायन के कारण मिली। उन्होंने न केवल लोकगीतों को स्वर दिया, बल्कि गढ़वाली भाषा, लोकनाट्य, लोकगाथाओं और सांस्कृतिक अस्मिता को एक नई पहचान दी।
2 फ़रवरी 1927 को जनमे और 21 जून 2020 को 94 वर्ष की आयु में देहरादून में इस संसार से विदा लेने वाले इस महान कलाकार का जीवन लगभग एक शताब्दी तक फैला हुआ वह कालखंड है, जिसमें उत्तराखण्ड की लोक-संस्कृति ने आधुनिकता की दहलीज़ पर कदम रखा। उनकी जन्मशताब्दी 2 फ़रवरी 2027 को मनाई जानी है—यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि एक युग का स्मरण है।