पश्चिम एशिया संकट — तेल से ज्यादा गैस के मोर्चे पर है चुनौती
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(महाबीर सिंह – वरिष्ठ पत्रकार)
ईरान के खिलाफ अमरीका-इजरायल की लड़ाई शुरू हुये दो सप्ताह बीत चुके है। दोनों तरफ से एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने के अपने अपने दावे किये जा रहे हैं लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि इस लड़ाई की आंच अब भारत सहित दुनिया के तमाम देशों तक महसूस की जाने लगी है। कच्चे तेल के दाम 100 डालर प्रति बैरल को लांघ चुके हैं। इस संकट से तेल-गैस के दाम में भारी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। तेल, गैस उपलब्धता को लेकर बढ़ती आशंका के बीच सरकार को बार बार सफाई देनी पड़ रही है।
हालांकि, सरकार का कहना है कि देश में पेट्रोल, डीजल, मिट्टी तेल, विमान ईंधन की कोई कमी नहीं है। लेकिन, गैस के मामले में सरकार ने माना है कि वैश्विक स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण है। अप्रत्याशित परिस्थितियों के चलते प्राकृतिक गैस आपूर्ति प्रभावित हुई है, उसकी भरपाई के लिये अन्य रास्तों और आपूर्तिकर्ताओं के जरिये खरीद का काम चल रहा है। स्थिति का मुकाबला करने के लिये मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाये रखने को कई कदम उठाये गये हैं। आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत प्राकृतिक गैस और एलपीजी नियंत्रण आदेश जारी किया गया है जिसमें तेल रिफाइनरियों को ज्यादा से ज्यादा एलपीजी उत्पादन करने को कहा गया है।
यह सही बात है कि वर्तमान में कच्चे तेल के मामले में स्थिति उतनी कठिन नहीं है जितनी कि गैस के मामले में है। भारत दुनिया के 40 देशों से कच्चा तेल खरीदता है इसके साथ ही देश में 45 दिन की खपत के बराबर रणनीतिक तेल भंडार भी है। लेकिन जहां तक गैस की बात है इसका देश में कोई रणनीतिक भंडारण नहीं है और न ही इसके बारे में फिलहाल कोई योजना बनी है। लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) का सबसे अधिक आयात कतर से होता है। देश की कुल एलपीजी खपत का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा आयात किया।