कब थमेगी फूलों की घाटी की आग–ज्ञानेन्द्र रावत
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देश-दुनिया में मशहूर, यूनेस्को द्वारा घोषित विश्व धरोहर, धरती का स्वर्ग, बायोस्फीयर रिजर्व, सर्वाधिक संवेदनशील इलाका, हिम तेंदुआ और हिमालयी भालू और ब्रह्मकमल आदि जैसी असंख्य दुर्लभ प्रजातियों के लिए विख्यात उत्तराखंड राज्य की शान, चमोली जिले में नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान के बफर जोन के अंतर्गत आने वाली फूलों की घाटी, जहां हर साल हजारों पर्यटक कुदरत की खूबसूरती देखने आते हैं, बीती नौ जनवरी से लगी आग से लगातार धधक रही है। यहां सबसे पहले पेनावडी और भ्यूंडार रेंज की पहाड़ियों पर आग लगी थी। सबसे बड़ी बात यह कि अलकनंदा और लक्ष्मण गंगा नदियों के बीच स्थित 13 हजार फीट की ऊंची चट्टानों, पेड़ व पत्थर गिरने और जलते पेड़ों के बीच राहत व वनकर्मियों के लिए आग बुझाने के लिए पहुंचना बेहद मुश्किल भरा साबित हो रहा है। यहां न सड़क है और न पैदल रास्ता। यही वह अहम वजह है जिसके चलते एस डी आर एफ पी भी मौके पर नहीं पहुंच पा रही है। इसमें अति आधुनिक उपकरणों व संसाधनों का अभाव भी राहत कर्मियों के लिए सबसे बड़ी बाधा बन रहा है। फिर बड़ी तादाद में मौजूद यहां सूखी झाड़ियां, सूखी पत्तियां, सूखे पेड़ और लकड़ियां भी आग फैलने में अहम भूमिका निबाह रही हैं। जंगलों में दूर से ही धुंए का गुब्बार और आग की लपटें दिखाई दे रही हैं। अब तो यह आग नंदा देवी पार्क के नीचे के इलाके में हरे पेड़ों तक पहुंच गयी है। जबकि प्रशासन यह दावा कर रहा है कि उसने फूलों की घाटी क्षेत्र के गोविंद गढ़ रेंज में, बद्रीनाथ की निजमुला घाटी व गौणा गांव के जंगलों में लगी आग पर आंशिक रूप में सफलता पायी है। लेकिन अभी भी आग से 15 हैक्टेयर से ज्यादा इलाका आग से धधक रहा है।
हकीकत यह है कि नीचे की ओर लगी आग बुझाने में तो वनकर्मी जुटे हुए हैं लेकिन इतने दिनों बाद भी इस दुर्गम इलाके में खड़ी चट्टानों पर लगी आग पर काबू पाने में प्रशासन खुद को असमर्थ पा रहा है। चिंता की मुख्य वजह यह भी है कि फायर सीजन से पहले ही इस बार सर्दियों के मौसम में उत्तराखंड जो देवभूमि के नाम से विख्यात है, में जंगल धधक रहे हैं। यही नहीं नमी,ठंड और शांत पहाड़ इस आग से तप रहे हैं। जबकि अभी न बारिश है और न ही बर्फबारी हुयी है। अभी यह हालत है तो गर्मी के सीजन अप्रैल- मई में जब तापमान 35-40 से ऊपर पहुंचेगा, तब क्या होगा ? यह हालत उत्तराखंड में किसी क्षेत्र विशेष की नहीं है, इससे गढ़वाल और कुमाऊं अंचल भी अछूता नहीं रहा है। हकीकत यह है कि उत्तरकाशी में वरणावत के पहाड़ी क्षेत्र, दशोली के निजमुला घाटी , पेनखंडा, पुलना, म्यूंडार,पौढी के जामणाखाल, लाता, मैंग्यूल, सल्ला कम्यार और कुमांयू के अल्मोड़ा में हवालवडा,नहला और पाटलीबगड के जंगल आज भी कई दिनों से धधक रहे हैं, उनपर भी अभी तक अंकुश नहीं लग सका है। दुखदायी बात यह कि हवा के साथ आग और फैल रही है। जबकि मौसम विभाग की मानें तो अगले 10 दिनों तक बारिश की कोई संभावना नहीं है। यह हालात की गंभीरता का सबूत है।
वह बात दीगर है कि राहत कार्य में मदद के लिए वायु सेना के एम आई 16 हेलीकॉप्टर बांबी बकेट आपरेशन के लिए जोशीमठ में तैनात हैं। लेकिन उनका उपयोग प्रशासन हवाई सर्वे और आग की तीव्रता व भयावहता के आकलन के अलावा आपदा प्रबंधन के बीच समन्वय के बाद ही कर सकेगा। विडम्बना यह कि अभी भी वायु सेना और वन विभाग बांबी बकेट आपरेशन के मुद्दे पर सोशल मीडिया में वायरल एक वीडियो के मामले में बहस में उलझे हुए हैं। वायु सेना के एक वीडियो के मामले में डी एफ ओ चेतना कांडपाल ने साफ किया है कि अभी तक वायु सेना के हेलीकॉप्टर से आग बुझाने के नाम पर एक बूंद पानी डाला नहीं गया है।वहीं वायु सेना आग बुझाने में टिहरी-श्रीनगर डैम से पानी लाने में दिक्कत, पानी के स्रोत पास में नहीं होने और लॉजिस्टिक्स बेहद मुश्किल होने की बात कर रही है। वन विभाग ड्रोन व स्थानीय माध्यमों से आग की स्थिति पर नजर रखने के दावे करने में कीर्तिमान बना रहा है। विचारणीय यह है कि वन विभाग के पास आगजनी से हुए नुकसान की अभी तक कोई जानकारी नहीं है, वह केवल इतना ही कह रहा है कि जंगल की आग में सूखे पेड़ों के गिरने की वजह से बढोतरी हुयी है। वह यह बताने में आज भी नाकाम रहा है कि आग कैसे लगी,किसने लगायी,असामाजिक तत्वों का तो इसमें हाथ नहीं है या फिर शार्टसर्किट से लगी या फिर चरवाहों ने लगायी। जैसा कि अक्सर आरोप लगाया जाता है। असलियत यह है कि जंगल की आग में बढोतरी में वन विभाग की लापरवाही की अहम भूमिका है । यदि वह समय रहते सक्रिय हुआ होता तो इतना नुकसान नहीं होता। वह तो इसी इंतजार में रहा कि यह आग जब चोटी तक पहुंचेगी तब अपने आप बुझ जायेगी।
गौरतलब है कि इस आग में पर्यावरण का ही विनाश नहीं हुआ है,करोड़ों की लकड़ी ही नहीं जली है, लाखों-करोड़ों औषधीय पेड़-पौधे, पक्षी, वनस्पति, वन्य-जीवों के आवास, पारिस्थितिकीय तंत्र स्वाहा हुआ है। डी एफ ओ चेतना कांडपाल भी इसे स्वीकारती हैं। अब अहम सवाल यह है कि इस आग के लिए कौन जिम्मेदार है। क्या हर साल की तरह इस आग का मुद्दा भी फाइलों में दफन हो जायेगा। और यह कि क्या हमने आग बुझाने की तैयारी समय रहते की थी या अब की है। अगर नहीं तो क्यों नहीं। जबकि पहाड़ों पर आग लगने की घटनायें तो हर साल होती हैं। क्या हमने उनसे कोई सबक सीखा है। उन घटनाओं से सरकार कितनी सजग हुयी है। सरकार पर्यावरण संरक्षण की बात तो करती है लेकिन क्या वह हकीकत में पर्यावरण संरक्षण के प्रति गंभीर है। देश के मौजूदा हालात तो इसकी गवाही कतई नहीं देते। इस सवाल पर सरकार का मौन समझ से परे है। सरकार यह क्यों नहीं सोचती कि पहाड़ नहीं रहेंगे, वन संपदा इसी तरह आग की समिधा बनती रहेगी, तो ग्लेशियर खत्म हो जायेंगे, उस दशा में नदियां सूख जायेंगीं, जलस्रोत सूख जायेंग और हम पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसेंगे। तब क्या होगा? इस बारे में आमजन को भी सोचना होगा कि पहाड़ रहेंगे, वनस्पति रहेगी, हरियाली रहेगी तो पर्यावरण सुरक्षित रहेगा। पर्यावरण सुरक्षित रहेगा तो हमारा जीवन सुरक्षित रहेगा। जिस तरह जलवायु परिवर्तन हमें चेतावनी दे रहा है, उसे देखते हुए हमें भी सावधानी बरतनी होगी। प्रकृति से खिलवाड़ बंद करना होगा, उससे सामंजस्य बनाना होगा। जंगल बचाने की जिम्मेवारी हम सबकी है। अरावली प्रकरण एक चेतावनी है कि अब भी समय है संभल जाओ। यदि देवभूमि उत्तराखंड के जंगल इसी तरह जलते रहे तो एक दिन देवभूमि का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा। आपदाओं ने हमें समय-समय पर चेताया है लेकिन यदि अब भी हम नहीं संभले तो बहुत देर हो जायेगी और तब हाथ मलते रहने के सिवाय हमारे पास कुछ नहीं होगा।