“शुभ से लाभ और लाभ से लोभ की ओर जाती अरावली” — संजय राणा
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अरावली पर्वतमाला केवल पत्थरों और पहाड़ियों का समूह नहीं, बल्कि उत्तर भारत के पर्यावरणीय संतुलन की प्राचीन प्रहरी रही है। लगभग 3 अरब वर्ष पुरानी यह पर्वत श्रृंखला विश्व की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में गिनी जाती है। गुजरात से राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली अरावली ने सदियों तक जल, जंगल, जमीन और जीवन के बीच संतुलन बनाए रखा। किंतु आज अरावली संरक्षण की जगह उपेक्षा, संतुलन की जगह दोहन और शुभ से लाभ होते हुए लोभ की मानसिकता का प्रतीक बनती जा रही है। *जब अरावली शुभ थी*
एक समय था जब अरावली को प्रकृति का वरदान माना जाता था। इस पर्वतमाला ने थार मरुस्थल को पूर्व की ओर बढ़ने से रोका। मानसूनी वर्षा को थामकर इसने भू-जल पुनर्भरण का स्वाभाविक तंत्र विकसित किया। राजस्थान, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हजारों गाँवों के तालाब, जोहड़ और कुएँ अरावली के कारण ही जीवनदायी बने रहे। अरावली के जंगल जैव विविधता से भरपूर थे। तेंदुआ, सियार, नीलगाय, लोमड़ी और मोर जैसे जीव तथा धोक, खेजड़ी और बबूल जैसी वनस्पतियाँ इसकी पहचान थीं। ग्रामीण समाज की कृषि, पशुपालन और जीवनशैली प्रकृति के साथ संतुलन पर आधारित थी। यह वह दौर था जब अरावली ‘शुभ’ थी—मानव और प्रकृति के सह-अस्तित्व का प्रतीक थी।
विकास की दौड़ और लाभ की दृष्टि…
स्वतंत्रता के बाद देश में विकास को प्राथमिकता मिली। खनिज, उद्योग, सड़क और शहरी विस्तार को प्रगति का पैमाना माना गया। इसी सोच के तहत अरावली को भी खनिज संसाधन और भूमि भंडार के रूप में देखा जाने लगा। राजस्थान और हरियाणा में बड़े पैमाने पर पत्थर और खनिजों का खनन शुरू हुआ। दिल्ली-एनसीआर के विस्तार के साथ अरावली क्षेत्र रियल एस्टेट, फार्म हाउस और व्यावसायिक गतिविधियों का केंद्र बन गया। नीतिगत स्तर पर भी कई बार अरावली को वन क्षेत्र मानने से बचते हुए उसे “बंजर भूमि” साबित करने की कोशिशें हुईं। यही वह बिंदु था, जहाँ अरावली शुभ से लाभ की दिशा में बढ़ी।
*जब लाभ लोभ में बदल गया* समस्या तब गहरी हुई जब लाभ की सीमाएँ टूट गईं और लोभ हावी हो गया। खनन नियंत्रित उपयोग की जगह अवैध और अनियंत्रित दोहन में बदल गया। 2002 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा खनन पर रोक के बावजूद नियमों की अनदेखी लंबे समय तक होती रही। अरावली के वन क्षेत्रों में अवैध निर्माण, फार्महाउस और रिसॉर्ट खड़े हो गए। वन भूमि को छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटकर निजी स्वार्थ साधे गए।
*20 नवंबर 2025 का सुप्रीम कोर्ट का निर्णय : संरक्षण या विभाजन?*
अरावली के भविष्य को लेकर 20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट का निर्णय बेहद महत्वपूर्ण और विवादास्पद माना जा रहा है, हांलाकि जन दबावों में शीर्ष अदालत ने अपने ही निर्णय पर रोक लगाते हुये, पुनः विचार करने का निर्णय लिया है। शीर्ष अदालत ने यह स्पष्ट किया कि 100 मीटर से अधिक ऊँचाई वाली पहाड़ियाँ ही अरावली पर्वतमाला का हिस्सा मानी जाएँगी, जबकि 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियाँ अरावली के दायरे में नहीं आएँगी। कानूनी दृष्टि से यह निर्णय परिभाषा को स्पष्ट करने का प्रयास हो सकता है, लेकिन इसके पर्यावरणीय प्रभाव गहरे और दूरगामी हो सकते हैं। अरावली केवल ऊँचाई का नाम नहीं है। उसकी छोटी पहाड़ियाँ, ढलान, चट्टानें और वन क्षेत्र भी उसी पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्णय से अरावली के बड़े भूभाग को निर्माण और दोहन के लिए खोलने का रास्ता बन सकता है, विशेषकर हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में। यह आशंका इसलिए भी गंभीर है क्योंकि अतीत में अरावली को “बंजर” साबित कर विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के प्रयास होते रहे हैं। अब ऊँचाई की नई परिभाषा अरावली को कागजों में बचाने और ज़मीन पर कमजोर करने का जरिया न बन जाए—यह सबसे बड़ा सवाल है।
*इसके दुष्परिणाम पहले से ही दिख रहे हैं*
अरावली के क्षरण का असर अब साफ दिखाई दे रहा है। दरअसल
हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर में भू-जल स्तर लगातार गिर रहा है।
हरियाली घटने से धूल- प्रदूषण और वायु गुणवत्ता गंभीर होती जा रही है।
थार मरुस्थल के विस्तार का खतरा बढ़ रहा है। बाढ़, सूखा और अत्यधिक गर्मी जैसी घटनाएँ सामान्य होती जा रही हैं।
यह संकट केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और भविष्य की पीढ़ियों से जुड़ा है।
*असली सवाल : नीयत का*
कानून, न्यायालय और विशेषज्ञ अपनी भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन असली सवाल नीयत और इच्छाशक्ति का है। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए बिना लिया गया कोई भी निर्णय अंततः समाज को ही नुकसान पहुँचाएगा। *अब भी समय है
अरावली को बचाने के लिए*
ऊँचाई नहीं, पारिस्थितिकी तंत्र को संरक्षण का आधार बनाया जाए
अवैध खनन और निर्माण पर सख्त कार्रवाई हो। स्थानीय समुदायों को संरक्षण का सहभागी बनाया जाए
विकास की अवधारणा को प्रकृति के साथ जोड़ा जाए। अरावली हमें चेतावनी देती है कि जो शुभ होता है वही स्थायी लाभ देता है, लेकिन जब लाभ लोभ में बदल जाता है, तो विनाश तय हो जाता है।
20 नवंबर 2025 का सुप्रीम कोर्ट का निर्णय एक कानूनी परिभाषा जरूर देता है, लेकिन यह समाज और सरकार की जिम्मेदारी है कि इसे अरावली के कमजोर होने का औजार न बनने दिया जाए। आज प्रश्न यह नहीं कि अरावली कितनी ऊँची है, बल्कि यह है कि हमारी सोच कितनी ऊँची है। यदि समय रहते अरावली को नहीं बचाया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें विकास का नहीं, विनाश का उत्तरदायी मानेंगी। अरावली का संरक्षण केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं, बल्कि हमारी नीति, नैतिकता और भविष्य-दृष्टि की परीक्षा है।