दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र  की ओर से  गढ़वाली काव्य संग्रह ‘प्रकृति अर प्रेरणा’ का लोकार्पण

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देहरादून। दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र, देहरादून की ओर से गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 के  सांयकालीन सत्र में गढ़वाली कवि अरविन्द ‘प्रकृति प्रेमी’ के नवीनतम काव्य संग्रह ‘प्रकृति अर प्रेरणा’ का लोकार्पण  व उस पर चर्चा का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्यिक पत्रिका ‘चिट्ठी–पत्री’ के प्रधान संपादक मदन मोहन डुकलाण ने की। साहित्यकार एवं रंगकर्मी डॉ. नन्दकिशोर हटवाल मुख्य अतिथि तथा गढ़वाली भाषा के सक्रिय लेखक और साहित्यकार शान्ति प्रकाश ‘जिज्ञासु’ विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों की श्रंखला के अंतर्गत  इस कार्यक्रम का उद्देश्य क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य को प्रोत्साहित करना, स्थानीय रचनाकारों को विचार-विमर्श का मंच उपलब्ध कराना तथा उत्तराखण्ड की भाषाई और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन को बढ़ावा देना था।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी ने अतिथियों, साहित्यकारों, कवियों और उपस्थित सुधीजन का स्वागत एवं अभिवादन किया। उन्होंने कहा कि पुस्तकालय केवल पुस्तकों के अध्ययन और संग्रह का स्थान नहीं, बल्कि साहित्य, विचार, संवाद और रचनात्मक अभिव्यक्ति का भी महत्वपूर्ण केन्द्र है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्यकारों को पाठकों से जोड़ने तथा उत्तराखण्ड की समृद्ध साहित्यिक परम्परा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता है। उन्होंने गढ़वाली भाषा में निरन्तर हो रहे साहित्यिक सृजन को महत्वपूर्ण बताते हुए सभी अतिथियों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए मदन मोहन डुकलाण ने कहा कि अरविन्द ‘प्रकृति प्रेमी’ की कविताएं आशा जगाती हैं। उनकी रचनाएं समाज को एक कदम आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं। उनकी कविता अंधकार को दूर कर मनुष्य और समाज को उजाले की ओर ले जाने का प्रयास करती है।
मुख्य अतिथि डॉ. नन्दकिशोर हटवाल ने कहा कि संग्रह की कविताओं में प्रकृति और पर्यावरण के प्रति प्रेम के साथ-साथ अंधविश्वास, सामाजिक अन्याय और कुप्रथाओं के प्रति असंतोष भी स्पष्ट दिखाई देता है। कवि ने गढ़वाली भाषा के मुहावरों का प्रभावशाली प्रयोग किया है। ठेठ गढ़वाली शब्दों की उपस्थिति इन कविताओं को स्थानीय जीवन और लोकानुभव से जोड़ती है।
विशिष्ट अतिथि शान्ति प्रकाश ‘जिज्ञासु’ ने कहा कि संग्रह की कुछ कविताओं का हिन्दी में अनुवाद किया जाए तो वे व्यापक पाठक समुदाय तक पहुंच सकती हैं। उनके अनुसार कवि चेतना और विचार के स्तर पर आगे बढ़ रहे हैं। ऐसी रचनाएं गढ़वाली कविता को राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में योगदान कर सकती हैं। उन्होंने कवि की रचनात्मक परिपक्वता को भी रेखांकित किया।
पुस्तक की समीक्षा करते हुए साहित्यकार शिवदयाल ‘शैलज’ ने कहा कि ‘प्रकृति अर प्रेरणा’ में छंदमुक्त, विचारप्रधान और चिंतनशील कविताएं हैं। ये रचनाएं समकालीन कविता की प्रवृत्तियों के साथ चलते हुए समाज में गहरी जड़ें जमाए विसंगतियों, विद्रूपताओं, पाखंड और आडंबर पर तीखा प्रहार करती हैं। उन्होंने इसे वर्तमान गढ़वाली कविता में नए रास्तों की तलाश करने वाला संग्रह बताया।
संग्रह की भूमिका लिखने वाले डॉ. उमेश चमोला ने कहा कि कवि की रचनाएं प्रकृति और मनुष्य के आपसी संबंधों को अभिव्यक्त करती हैं। इनमें आज के समाज के कठोर यथार्थ के साथ सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वास के विरुद्ध मुखर स्वर दिखाई देता है।
डॉ. सत्यानन्द बडोनी ने संग्रह की भाषाई विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कवि ने टिरियाली, विशेषकर भिलंगना और बालगंगा घाटियों में प्रचलित रहे तथा अब कम सुनाई देने वाले शब्दों को अपनी कविताओं में स्थान देकर उन्हें जीवंत करने का प्रयास किया है। ‘भैंणु’, ‘अबलिखा’, ‘सम्यार’, ‘तर’, ‘खगळ’, ‘साबळ्या’, ‘बर्खा’, ‘साळ’ और ‘स्यंरा’ जैसे शब्द गढ़वाली भाषा के शब्द-भंडार को समृद्ध करते हैं। उन्होंने कविताओं में भाषा के मानकीकरण के प्रति कवि की सजगता को भी सकारात्मक पहल बताया।
इस कविता संग्रह की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें प्रकृति और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता को सामाजिक चेतना, लोकजीवन के अनुभवों और समकालीन समस्याओं के साथ जोड़ा गया है। कवि ने गढ़वाली के स्थानीय शब्दों, मुहावरों और भाषाई विविधता के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव बनाए रखा है। साथ ही, सामाजिक कुरीतियों और आडंबरों पर प्रश्न उठाकर कविता को विचार और बदलाव का माध्यम बनाने का प्रयास किया है। इस दृष्टि से संग्रह गढ़वाली भाषा के संरक्षण, संवर्धन और समकालीन साहित्यिक अभिव्यक्ति की दिशा में उल्लेखनीय है।
कार्यक्रम का संचालन कवयित्री बीना बेंजवाल ने किया। इस अवसर पर रमाकांत बेंजवाल, चंदन प्रेमी,  प्रेम पंचोली, सुरेश स्नेही, सुंदर सिंह बिष्ट, आलोक सरीन, कुलभूषण नैथानी, मदन बिष्ट सहित कई साहित्यकार, लेखक, साहित्य प्रेमी, बुद्धिजीवी वर्ग के प्रतिनिधि, युवा पाठक, संस्कृतिकर्मी, पुस्तकालय के पाठक और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। कार्यक्रम में प्रस्तुत विचारों ने गढ़वाली कविता की वर्तमान दिशा, क्षेत्रीय भाषा की समृद्धि और साहित्य की सामाजिक भूमिका पर सार्थक संवाद को आगे बढ़ाया।
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