उत्तराखण्ड बना पर उत्तराखण्डी उपेक्षित, पहाड़ों में खुशी व उल्लास नहीं : जगदीश ममगांई

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दिल्ली। उत्तराखण्ड रजत जयंती मना रहा है, उत्सव के साथ यह आत्मनिरीक्षण का पल है। लंबे संघर्ष, वर्षों के आंदोलन के बाद, उत्तराखण्ड राज्य का सपना साकार हुआ। उत्तराखण्ड राज्य संघर्ष में दिल्ली-एनसीआर के निवासी, प्रवासियों की सक्रिय भूमिका रही है। दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया पर उत्तराखण्ड राज्य गठन आंदोलनकारी संगठनों की समन्वय समिति द्वारा उत्तराखण्ड रजत जयंती वर्ष पर कार्यक्रम आयोजित किया एवं पृथक राज्य आंदोलन के लिए हुए रक्तरंजित संघर्ष में बतौर आंदोलनकारी, सामाजिक, राजनीतिक संघर्ष के सहभागी रहे राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन के राष्ट्रीय सह-संयोजक जगदीश ममगांई की पुस्तक ‘स्वाधिकार के लिए छटपटाता उत्तराखण्ड’ का विमोचन हुआ। इस अवसर पर आंदोलनकारी नेता व प्यारा उत्तराखण्ड के संपादक देव सिंह रावत, उत्तराखण्ड महासभा अध्यक्ष हरपाल सिंह रावत, उत्तराखण्ड कांग्रेस के उपाध्यक्ष धीरेन्द्र प्रताप, उत्तराखण्ड लोकमंच अध्यक्ष ब्रिज मोहन उप्रेती, आम आदमी पार्टी प्रवक्ता हरीश अवस्थी, भाजपा उपाध्यक्ष एवं उत्तरांचल प्रदेश संघर्ष समिति के महामंत्री रहे भगवत सिंह नेगी, अलकनंदा पत्रिका के संपादक विनोद ढौंडियाल, स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक चारु तिवारी, पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्त्ता अतुल सचदेव, पत्रकार व्योमेश जुगराण, खुशाल जीना सहित कई आंदोलनकारी संगठनों के नेता, पत्रकार, शिक्षाविद् व सामाजिक कार्यकर्त्ता उपस्थित थे। उत्तराखण्ड के शहीद आंदोलनकारियों को याद कर श्रद्धांजली दी गई।

भारतीय जनता पार्टी एवं उत्तरांचल प्रदेश संघर्ष समिति के आंदोलनकारी नेता रहे लेखक जगदीश ममगांई ने कहा कि उत्तर प्रदेश राज्य पुनर्गठन अधिनियम में किए प्रावधान गए के चलते 25 वर्ष बाद भी उत्तराखण्ड को अपनी संपत्ति, परिसंपत्तियों, राजस्व पर अपना अधिकार प्राप्त नहीं हुआ है। हरिद्वार में कुम्भ मेला, कांवड़ मेला क्षेत्र भी उत्तर प्रदेश सरकार ने हस्तांतरित नहीं किया। 25 वर्षों में 10 मुख्यमंत्री, निरंतरता और नीति दिशा की कमी को दर्शाते हैं। उत्तराखण्ड में ग्रामीण कृषि भूमि की खरीद-फरोख्त पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने संबंधी सशक्त भू कानून, राज्य को भारतीय संविधान की पाँचवीं अनुसूची में शामिल करने, पिछड़ा राज्य, विशेष दर्जा की श्रेणी, साल 1950 से मूल निवास का आधारभूत कानून लागू करने की मांग अनसुनी है। पहाड़ों में सीढ़ीदार खेत ढलानों पर छोटे-छोटे, टुकड़ों में बिखरे हैं जिसके लिए चकबंदी आवश्यक है। जिस जमीन पर कभी पीढ़ियों का भरण-पोषण होता था और शहर अपने संतान को भी पहुंचाते थे, वह अब अपना भरण-पोषण तक नहीं कर पा रही है। वन अधिनियम के प्रावधान उत्तराखण्डियों पर भारी पड़ रहे हैं, परंपरागत व रोजमर्रा के मामले भी इसमें अपराध की श्रेणी में हैं। जंगली जानवर फसल और बागवानी को नुकसान पहुंचा रहे हैं। वनों में पेड़ कटने, उजाड़ने, निर्माण के चलते जानवरों को अब जंगलों में भोजन नहीं मिल रहा, जिसके कारण जानवर मानव बस्तियों पर आक्रमण कर रहे हैं। जंगली सूअर, लंगूर, बंदर सैकड़ों लोगों पर हमला कर उन्हें घायल कर चुके हैं, लोगों की जान तक ले चुके हैं।

जगदीश ममगांई ने कहा कि तीर्थ स्थल, पवित्र पूजा क्षेत्र को पर्यटक के रुप में आने वाले लोग कूड़ा-करकट, प्लास्टिक की बोतलें आदि से दूषित करते हैं। बद्रीनाथ में मलबा बढ़ रहा है, धनी पर्यटकों के आभामंडल में केदारनाथ का भक्तिभाव डूब गया है। अलग राज्य बनने के बाद पहाड़ी क्षेत्रों में बेहतर विकास, अधिक पूंजी निवेश की उम्मीद थी। पिछले 25 वर्षों में आर्थिक विकास मुख्यतः मैदानी जिलों में केन्द्रित रहा है। पहाड़ी जिलों में प्रति व्यक्ति आय देहरादून और हरिद्वार की तुलना में लगभग आधी है। पहाड़ों में शराबखोरी एक बड़ी समस्या है, युवा ही नहीं, छोटे बच्चे भी शराब की चपेट में आ रहे। महिलाओं द्वारा सामाजिक और आर्थिक बर्बादी के विरुद्ध किया जा रहा शराब विरोधी आंदोलन जारी है। महिलाएं ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आन्दोलन कर अपनी भावी पीढ़ी को बचाने की कोशिश कर रही हैं। यहां तक कि 75-80 वर्ष की आयु की महिलाएं भी अपनी छड़ी टेकते हुए नशे कि विरुद्ध नारे लगाती, संघर्ष करती दिखती हैं।

जगदीश ममगांई ने कहा कि 25 वर्ष में अस्थायी राजधानी के बावजूद देहरादून में व ग्रीष्म राजधानी गैरसैंण (भराड़ीसैंण) में बुनियादी ढांचा तैयार करने में अरबों रुपए खर्च हो चुके हैं। गरीब प्रदेश दो-दो जगह विधानसभा, उसके प्रबन्धन पर दोगुना खर्चा कर रहा है जबकि पूरे वर्ष भर में देहरादून व गैरसैंण (भराड़ीसैंण) में केवल 8-9 दिन विधानसभा चलती है। उत्तराखण्ड की पहाड़ी जनता भले ही गरीब हो, राज्य आर्थिक दबाव में हो, कर्जदार हो परन्तु उत्तराखण्ड के विधायक भारत में सबसे ज्यादा वेतन पाने वालों में से हैं, वेतन-भत्तों सहित लगभग चार लाख रुपये प्रति माह व कैशलेस इलाज की सुविधा मिलती है। इसके साथ ही पूर्व विधायकों को भी 60,000 रुपये प्रतिमाह पेंशन व पेट्रोल-डीजल के लिए अतिरिक्त भत्ता दिया जाता है। राज्य बनने के उपरान्त भी उत्तराखण्ड में अपनी क्षेत्रीय भाषाओं को आधिकारिक भाषा के रुप में मान्यता नहीं है। विभिन्न राज्यों में देखने में आता है कि सूचना पट स्थानीय भाषाओं में लिखे होते हैं फिर उत्तराखण्ड राज्य में सरकारी कामकाज, सूचना पट त्रिभाषिक क्यों नहीं?

जगदीश ममगांई ने अफसोस जताया कि उत्तराखण्ड आंदोलनकारियों की हत्या व महिला आंदोलनकारियों के साथ हुए दुष्कर्म के दोषियों को सज़ा नहीं दिला पाए, न ही उत्तराखण्डी आंदोलनकारियों को सम्मान मिला और न ही आंदोलनकारियों के सपनों का उत्तराखण्ड बना पाए। उत्तराखण्डी आंदोलनकारियों की हत्या व महिलाओं के साथ दुष्कर्म के दोषियों तथा कार सेवकों के हत्यारों को पदोन्नति मिली और इन कुकृत्यों के संरक्षक मुलायम सिंह यादव को असाधारण कार्य करने के लिए दिए जाने वाले भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म विभूषण से सम्मानित कर उत्तराखण्डियों व हिन्दू समाज के जख्मों पर नमक छिड़का गया।

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