पारंपरिक तकनीकी से होगी जल वापसी – सुरेश भाई
1 min read
देहरादून। जल का अस्तित्व जमीन और जंगल से जुड़ा हुआ है।इसलिए जल,जंगल,जमीन को अलग-अलग वस्तुओं के रूप में नहीं देखा जा सकता है। उदाहरण है कि 60-70 के दशक में वनों का भारी मात्रा में जब व्यापारिक दोहन होने लगा तो उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में दो प्रकार की समस्या देखने को मिलीं। पहला नदी जल ग्रहण क्षेत्र में भूस्खलन तथा दरारें और दूसरा जल स्रोतों और तालाबों का सूखना। उसके बाद चिपको आंदोलन का जन्म जल और जमीन के अस्तित्व में अहम भूमिका निभाने वाले “वृक्षों” को बचाने के लिए हुआ।
वनों के बीच रहने वाले लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि एवं पशुपालन रहा है जिससे उन्हें भोजन और वस्त्र भी पर्याप्त मात्रा में मिलते थे।पशुपालक एक ही स्थान पर नहीं रहते थे। उन्हें जहां-जहां पर पशुओं के लिए चारा मिलता था, वहीं पर उनका बसेरा भी बन गया। जो धीरे-धीरे गांव के रूप में विकसित हुये हैं जहां पर लोगों ने अपने और मवेशियों के पानी की आवश्यकता की पूर्ति के लिए गड्ढे नुमा आकार के आयताकार अथवा धरती की भौगोलिक संरचना के अनुसार चाल-खाल बनाये जो छोटे तालाबों का ही एक रूप है। इनमें दो प्रकार से पानी जमा होता है। पहला धरती के अंदर से निकलने वाले पानी के स्रोत से दूसरा वर्षा जल से जमा होता था। इस प्रकार के सहस्रों तालाब लोगों ने बनाये। उनसे साल भर पानी की आपूर्ति होती थी। बाद में जैसे-जैसे कृषि का विकास हुआ घाटियों में भी पानी को एकत्रित करने के लिए चाल- खाल बनने लगे जिसका इस्तेमाल सिंचाई के रूप में भी हुआ। इसके अलावा प्राकृतिक उथल-पुथल, हिमनदों के विखंडन, बुग्यालों में जल संचय आदि ऐसे उदाहरण हैं जिसके कारण प्राकृतिक झीलें और तालाब बने हैं। उनका अस्तित्व ग्लेशियर और जैव विविधता पर टिका रहता है।
यदि इसका एक भी हिस्सा खतरे में पड़ गया तो प्राकृतिक झीलें और तालाब टूट कर भीषण बाढ़ की स्थिति भी पैदा कर सकते हैं। इस प्रकार पानी तभी तक मौजूद है जबतक उसके सभी घटक स्वस्थ हों। पुराने समय में पशुपालक और किसानों द्वारा निर्मित किये गये चाल-खाल के अवशेष पर्वतीय गांव के जंगल, खेती और चारागाह में दिखाई देते हैं जिसमें अधिकतर अवशेषों मे गाद भर गया है। उसके आसपास का पानी भी सूख गया है। जहां पहले गांव में 10 जल स्रोत थे वहां अब 2-3 ही बचे हुए हैं। औद्योगिक क्रांति और खेती में आधुनिक परिवर्तन से भी गांव के तालाब मृत प्रायः हुये। इससे भी बुरा प्रभाव तब सामने आया जब पेयजल के नाम पर सीमेंट की डिग्गियां और हौज का निर्माण होने लगा। गांव में पाइप लाइन आने लगी और सिंचाई के लिए नहरों का निर्माण हुआ। उनके निर्माण में सीमेंट का अधिक से अधिक इस्तेमाल होने से जल स्रोत सूखने लगे। परिणामस्वरूप गांव में पानी की पाइपलाइन तो पहुंच गई लेकिन उसमें पानी धीरे-धीरे कम होने लगा। क्योंकि जल स्रोत के चारों ओर जिस तरह का हरित निर्माण होना चाहिए था उसके स्थान पर सीमेंट ने जल स्रोत के रास्ते को ही अवरुद्ध करने का काम किया है। इस तरह आधुनिक समय में चाल- खाल जैसी पारंपरिक जल संरक्षण की व्यवस्था हाशिये पर चली गई।
वर्तमान में पारंपरिक संरक्षण का महत्व और अधिक बढ़ गया है। क्योंकि जहां पर वृक्षविहीन ढालदार स्थानों पर गांव बसे हुए हैं उसके आसपास सूख गये जल स्रोतों के पुनर्जीवन के लिए जल ग्रहण क्षेत्र में श्रृंखलावद्ध छोटे-बड़े चाल- खाल बनाकर वर्षाजल एकत्रित किया जा सकता है जिनके चारों ओर चौड़ी पत्ती के सघन वृक्षारोपण की आवश्यकता है। जिससे जल संरचनाओं में एकत्रित वर्षा जल को धूप से भी बचाया जा सकता है। इसका त्वरित प्रभाव जमीन के अंदर नमी दिखाई देगी जिससे पुराने जल स्रोत भी पुनर्जीवित हो सकते हैं। भूमि कटाव भी इस प्रक्रिया से नियंत्रित किया जा सकता है। जंगली जानवरों और जीव- जंतुओं को पीने का पानी उपलब्ध होता है और लंबे समय तक एकत्रित जल की मात्रा वायुमंडल में जल चक्रीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है।इससे वनों में लगने वाली आग को भी नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जब इसको एक मजबूत पारंपरिक निर्माण पद्धति और मौजूदा तकनीकी इन दोनों के समागम से गंभीरता पूर्वक कार्य किया जा सके जिसमें अभियंता, किसान और पशुपालक गांव में जल संरक्षण की लकीर खींचने में अहम भूमिका निभा सकें। इसमें पुराने तालाबों में भरे हुए गाद को हटाने की पहली प्राथमिकता हो। क्योंकि हिमालय के पर्वतीय इलाकों में जब सघन वन थे तो लोग खेती और पशुपालन के लिए वनों का संतुलित दोहन करते थे। चाल-खाल में भी पानी लहराता था। वर्तमान समय में बारिश बहुत कम होने लगी है। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। जैव विविधता कम हो रही है। इसमें जरूरी है कि जितना भी पानी वर्षा के रूप में आ रहा है उसकी बूंदें धरती के पेट में जमा हो। इसके लिए धरती में संभावित जल ग्रहण क्षेत्र में अधिक से अधिक जल संरचनाओं के निर्माण की आवश्यकता है। क्योंकि बदलती जलवायु में गाद भरने की संभावनाएं बढ़ गई है।
अतः जल संरचनाओं से गाद निकालने की व्यवस्था नहीं होगी तो धरती के पेट में पानी जमा नहीं हो पाएगा। इसलिए पारंपरिक ज्ञान के आधार पर गांव और नगर की जल समिति के पास जल संरचनाओं के निर्माण की पारंपरिक तकनीकी के लिए आर्थिक संसाधन कल्याणकारी राज्य व्यवस्था को उपलब्ध कराने चाहिए। उत्तराखंड में अनेक स्वयंसेवी संगठन, पर्यावरण कार्यकर्ता कुदाल उठाकर चाल- खाल का निर्माण कर रहे हैं। इसमें प्रमुख रूप से कुमाऊं क्षेत्र में चंदन नयाल, जगदीश नेगी, बच्ची सिंह बिष्ट, मोहन चंद्र कांडपाल आदि है। दूसरी तरफ गढ़वाल क्षेत्र में जल जंगल जमीन के अस्तित्व में मुख्य भागीदारी निभाने वाले वनों के कटान को रोकने के लिए रक्षासूत्र आंदोलन की टीम, देहरादून में पर्यावरणविद् डॉ० रवि चोपड़ा, त्रिलोचन भट्ट, विजय भट्ट, अनूप नौटियाल, प्रसिद्ध महिला नेत्री कमला पंत आदि शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्र में पानी बचाने के लिए वनों को कटने नहीं दे रहे हैं।ऐसे अनेक सामूहिक प्रयास जल संरक्षण की पारंपरिक एकीकृत व्यवस्था को मजबूत कर सकते है।