​आधुनिक गढ़वाली कविता पर विमर्श संगोष्ठी आयोजित

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देहरादून।​ सौं-करार लोकभाषा साहित्यिक समिति, टीरी की ओर से अरविंद ‘प्रकृति प्रेमी’ के दिशा-निर्देशन में राजधानी देहरादून में आधुनिक गढ़वाली कविता पर विमर्श संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें उपस्थित सभी रचनाकारों ने अपने-अपने विमर्शीय विचार रखे।
​कार्यक्रम के बतौर मुख्य अतिथि डॉ० इन्द्रमणि सेमवाल ने समय और परिस्थिति के अनुरूप कविता में रचनात्मक परिवर्तन के विचार पर जोर दिया और गीतकाव्य में अधिक संप्रेषणीय क्षमता की बात कही। वहीं कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि डॉ० हर्षमणि भट्ट ने आधुनिक कविता को गद्य साहित्य के अधिक निकट बताया साथ ही कविता के जन कल्याण होने पर जोर दिया और कहा कि हमें अतीत की बुराइयों का त्याग कर अच्छाइयों को ग्रहण करके उसे वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए जिससे कि रचना समाज के लिए भविष्य उन्मुख हो। वहीं संस्था के संस्थापक अध्यक्ष अरविंद ‘प्रकृति प्रेमी’ ने अपनी बात में आधुनिक कविता के संबंध में मुक्तिबोध के कविता सूत्र- “संवेदनात्क ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना” के माध्यम से कविता में संवेदना में ज्ञान और ज्ञान में संवेदना के अर्न्तसंबंध, मार्मिक आलोचनात्मक दृष्टि में कवि कर्म को समाज के अंतर्विरोधों को समझने वाली रचनात्मकता को रचना प्रक्रिया से जोड़ा जिसमें वैज्ञानिकता, तर्क, सत्ता और समाज से तीखे प्रश्न उठाने, आवश्यक सामाजिक बदलाव, अंधविश्वास, रूढ़ियों के प्रति प्रतिरोध, लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए मनुष्यता बचाए रखने, स्त्री चेतना में उनके अधिकार, हकों की रचनात्मक भूमिका, समाज से खत्म हो रही सामाजिक सामूहिकता के संकट पर रचनात्मक चिंता जताई।
​डॉ. सत्यानंद बडोनी ने, सामाजिक संघर्ष, विसंगतियों, यथार्थ से आधुनिक कविता के स्वरूप को रेखांकित किया और सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन की बात की और सामाजिक रूढ़ियों, अंधविश्वासों का विरोध आधुनिक प्रतीकों, बिंबों के माध्यम से रचना में समाहित करने को लेकर विमर्श किया। साथ ही अरविंद ‘प्रकृति प्रेमी’ द्वारा किये गये साहित्यिक गतिविधियों के प्रयासों की सराहना भी की। गीता गैरौला ने पलायन के कारण सामाजिक परिवर्तनों और अपनी सामाजिक पहचान को संजोए रखने पर रचनात्मक लेखन की बात कही।
​इस कार्यक्रम के दूसरे चक्र में कविता पाठ भी हुआ जिसमें डॉ. हर्षमणि भट्ट ने “शहरन गौं
घुळ्यालिन घळ” कविता से आधुनिक शहरी बदलाव में ग्रामीण परिवेश के बदलते स्वरूप पर चिंता को रेखांकित किया। अरविंद ‘प्रकृति प्रेमी’ ने अपनी रचना- ‘”पाखंडी माँ” से पाखंडवाद पर गहरी व्यंग्यात्मक चोट की। डॉ. सत्यानंद बडोनी ने- ‘”आखिरी घाण” के माध्यम से सामाजिक व्यवहार की झूठी औपचारिकता पर व्यंग्य किया। वहीं गीता गैरौला ने- “कख हर्चि रीति-रिवाज” नामक रचना सुनाई। इस प्रकार सभी ने एक से बढ़कर एक बेहतरीन वैचारिकी रचनाओं का काव्य पाठ किया।
​इस कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. सत्यानंद बडोनी ने किया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य गढ़वाली कविता साहित्य में आधुनिक कविता के रचनात्मक लेखन को बढ़ावा देना, उसे विकसित करना और रचनाकारों की रचनाधर्मिता की बेहतरी था।

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