क्षेत्रीय भाषाओं के डिजिटल संरक्षण के लिए जनभागीदारी जरूरीः सच्चिदानंद सेमवाल

मसूरी । उत्तराखंड भाषा एआई की कोर लीडरशिप के सच्चिदानंद सेमवाल ने मसूरी प्रेस क्लब में पत्रकारों से बातचीत में कहा कि उत्तराखंड की क्षेत्रीय भाषाओं के डिजिटल संरक्षण के लिए जनभागीदारी का होना जरूरी है। तभी इसका डिजिलिटिकरण हो सकता है।
पत्रकारों से बातचीत में सच्चिदानंद सेमवाल ने कहाकि क्षेत्रीय बोलियों को आधुनिक तकनीक से जोड़ने का रणनीतिक रोडमैप बनाया गया है जिसमें उत्तराखंड की सभी भाषाओं का डिजिटलीकरण किया जायेगा। उन्होंने इसके लिए सांस्कृतिक डेटा संग्रह करने का आहवान किया। उन्हांेने कहा कि इसका मुख्य उद्देश्य स्थानीय एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए प्रामाणिक भाषाई डेटा जुटाना है व भाषा एआई टीम ने नागरिकों से विभिन्न जानकारी साझा करने का आग्रह किया। जिसमें गढ़वाली, कुमाउनी और जौनसारी किताबें और पांडुलिपियां, क्षेत्रीय शब्दकोश और अर्थ सहित शब्दावली, बोलचाल के शब्द, वाक्य और बोलियों की बारीकियां, आवाज की टोन और उच्चारण मैपिंग के लिए ऑडियो रिकॉर्डिंग, उन्होंने बताया कि यह पहल 1.5 करोड़ से अधिक नागरिकों के डिजिटल समावेशन को सुनिश्चित करते हुए उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के लिए डिजाइन की गई है। जमीनी स्तर के डेटा को स्पेशलाइज्ड वेक्टर एंबेडिंग और लोकल एलएलएम पाइपलाइन में बदलकर, भाषा एआई इन क्षेत्रीय भाषाओं को भाषिनी, गूगल, और चैटजीपीटी जैसे राष्ट्रीय और वैश्विक प्लेटफॉर्म से जोड़ेगा। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान, लीडरशिप टीम ने समुदाय की त्वरित और सक्रिय भागीदारी की सराहना की व कहा कि टीम मसूरी में समाज के लोगों से मिल रहे भारी समर्थन से बेहद उत्साहित हैं, जहां स्थानीय निवासी, लेखक और सांस्कृतिक पैरोकार बुनियादी ग्रंथ और महत्वपूर्ण भाषाई डेटा जुटाने में हमारी सक्रिय रूप से मदद कर रहे हैं। इस मौके पर टीम लीडरशिप के सच्चिदानंद सेमवाल के साथ अनिल गोदियाल और राजेंद्र सिंह रावत भी मौजूद रहे।

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