भारत है विश्व का ‘हृदय’, ईश्वर का अवतरण यहीं होता हैः भारती

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देहरादून । ईश्वर सदा भक्तों के हृदय में वास करते हैं, उनका प्राकट्य जब भी हुआ महान भारत भूमि पर हुआ, फिर साकार स्वरूप में उन्होंने अनेकों लीलाएं करते हुए भक्तों को कल्याण का मार्ग प्रदान किया, इसीलिए! महापुरुष भारत को विश्व का हृदय कहा करते हैं। आज ‘दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान’- देहरादून के निरंजनपुर स्थित सभागार में भारतीय नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, विक्रमी संवत् 2083 को भव्य पैमाने पर मनाया गया और साथ ही नवरात्रि पर्व की पावन बेला पर माता शेरांवाली के गुणानुवाद में अनेक दृष्टांत भी प्रस्तुत किए गए। भक्तों-साधकों की विपुल संख्या में उपस्थिति के बीच वक्ताओं ने भारतीय नववर्ष पर भी अनेकों जानकारियां प्रदान कीं। कार्यक्रम की शुरुआत पर भारतीय वैदिक परम्परा का निर्वहन करते हुए मंचासीन ‘दिव्य ज्योति वेद मंदिर’ के वेदपाठियों ने वैदिक ऋचाओं का दिव्य गायन करते हुए वातावरण को भारतीय संस्कृति के रंग में रंग दिया। तत्पश्चात! मधुर भजनों की प्रस्तुति से संगीतकारों द्वारा भक्तजनों को निहाल किया गया। आज के भजनों को मुख्यतः नूतन भारतीय वर्ष तथा मां जगदम्बिका भवानी के गुणगानों पर ही केंद्रित किया गया था। भजनों की सारगर्भित व्याख्या करते हुए मंच का संचालन साध्वी विदुषी सुभाषा भारती जी के द्वारा किया गया। उन्होंने कहा कि महापुरूषों का सत्संग प्राप्त हो जाना एक दुर्लभ बात है और जिन्हें यह प्राप्त हो जाता है, वे बड़े सौभाग्यशाली जीव हुआ करते है। उन्होंने यह भी कहा कि ईश्वर एक हैं और उन्हें एकता पसन्द है। नववर्ष पर यह संकल्प लिए जाने की आवश्यकता है कि मानवीय एकता के लिए सभी भक्तजन ‘‘वसुधैवकुटुम्बकम’’ की महापुरूषीय अवधारणा को स्थापित करने के लिए स्वयं को अर्पित करेंगे।
कार्यक्रम में अपने प्रवचनों को प्रस्तुत करते हुए ‘दिव्य गुरू श्री आशुतोष महाराज जी’ की शिष्या तथा देहरादून आश्रम की प्रचारिका साध्वी विदुषी जाह्नवी भारती जी ने भारतीय नववर्ष की सभी साधकों-भक्तों को अपनी हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए उन्हें अनेक दृष्टांत भी सुनाए, विशेषकर भारतीय नववर्ष पर आरम्भ होने वाले अनेकों उल्लेखनीय कार्यों को भी संगत के समक्ष रखा। उन्होंने बताया पावन भारत भूमि ही मात्र सारे विश्व में ऐसी भूमि है जहां संतों-महापुरूषों के साथ-साथ वह परमात्मा भी अवतार धारण करता आया है। भारतवर्ष को ‘विश्व गुरू’ बताते हुए उन्होंने कहा कि यह इसलिए विश्व गुरू है क्योंकि! यहां पर इसके ऋषियों-मनीषियों की आध्यात्मिक विरासत विद्यमान है। अनेकों हमले तथा लूट-खसोट के बावजूद आज भी भारत इसी विरासत के बल पर अखण्ड खड़ा है, मज़बूत बना हुआ है। साध्वी जी ने यह भी बताया कि आज भी इसी महान भूमि पर ‘दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान’ के संस्थापक-संचालक ‘परम गुरू आशुतोष महाराज’ द्वारा जो ‘विश्व शांति’ का महान उद्घोष किया गया था, वह आज सम्पूर्णता की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है, वह दिन अब दूर नहीं जब भारत ही सम्पूर्ण जगत को शांति तथा मानवता का ‘दिव्य उपहार’ प्रदान करेगा और यह भारत फिर से ‘जगत गुरू’ कहलाएगा। इसी के साथ प्रसाद का वितरण कर साप्ताहिक कार्यक्रम को विराम दिया गया।

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