शिक्षा की ढुलमुल कमजोर व्यवस्था के चलते गिरते मानक…
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विजय डोभाल….
राजस्थान। गिरते हुए शिक्षा स्तर पर आज चर्चाएं होनी जरुरी हो जाती हैं जब शिक्षा मंदिर जार जार होकर नौनिहालों की जान ले रहे हैं, दोषी जो भी हों उनका मन उन्हें अवश्य दुत्कारता होगा, कचोटता होगा, विषय अवश्य सम्वेदनशील चिंतन – मनन योग्य है ! धन्यवाद आपको थोड़ा सोचने पर विवश हुए। सच कहने का साहस जो भी करे स्वागत – सत्कार योग्य है, मेरी तरह अनेक शिक्षा भिक्षुक सहमत होंगें !
दुर्भाग्य – इस दौर में शिक्षा संस्थानों के कल्याण की अपेक्षा लोगों की प्राथमिकताएं मन्दिर बन चुके हैं, ये अच्छी बात है, पर काश ! जिस ज्ञान गंगा ने हमें धार्मिक संस्थानों व कर्मकांडो की ओर जाने के लिए विवश किया, अग्रदूत, अनुगामी – प्रतिगामी बनाया उसी की उपेक्षा करना किसी भी समाज के लिए तब और चिंता की बात हो जाती है जब पूरी की पूरी व्यवस्था ही इसी का अनुकरण करने लगे !
कुछ भूभागों को छोडकर देश, शहर, गांव , कॉलोनियां वास्तव में शत प्रतिशत एलीट व उच्च साक्षरता से लबरेज़ हो चुके हैं, जबकि शिक्षा ग्रहण करना व शिक्षा पाने में बड़ा अन्तर है, शिक्षा का व्यवसायीकरण होने से आज शिक्षा का उद्देश्य डिग्री पाकर नौकरियों तक पहुँचना रह गया है, उसे ज्ञान प्राप्त कर आत्मसात करना नहीं, डिग्रियां कुंजी पढ़कर अवश्य प्राप्त की जा सकती हैं पर सर्वांगीण मानसिक विकास व ज्ञान पाने के लिए तो पोथी पढ़नी होगी।
हमारी पीढ़ी के अधिकांश लोग सरकारी विद्यालयों में पढ़े हैं, वहीं से योग्यतानुसार उच्च, मध्यम पदों तक पहुँचे हैं, कारण तब प्राइवेट विद्यालय न के बराबर थे। अध्यापक जिम्मेदारी से अपने पद की गरिमा व मर्यादाओं का पालन करते थे, शिक्षा को ज्ञान की पराकाष्ठा समझा जाता था।
याद कीजिये मास्टरजी के हाथ में वह मोटा डंडा? हमने खूब मार खाई है स्कूल में मास्टरजी की और घर में माँ की, पिताजी जॉब में बाहर थे, वहीं क्रम नौकरी में भी पीछा करता रहा अंतर इतना था, वहाँ डण्डे के स्थान पर शारीरिक दंड दिया जाता था, क्योंकि वह प्रौढ युवाओं की कक्षा हुआ करती थी, सभी के सभी प्रौढ, हम ही छोटे हुआ करते थे, इसलिए डंडे के स्थान पर शारीरिक दंड को प्राथमिकता देते थे। पर वर्तमान में शिक्षक – छात्रों के मध्य दूरी कम हो गयी, ऊपर से सरकारी फरमान अध्यापक बच्चों को पीटेंगे नहीं इसका परिणाम अध्यापक उदासीन होने से छात्रों में शिक्षकों का खौफ नहीं रहा , वह दोस्ती में बदल गया, जिससे छात्र परीक्षा में गुरु से नकल कराने की अपेक्षा तक रखता है, और ऐसा होता हुआ दिखता भी है, समय बदला गुरु शिष्य साथ साथ गुटके का आदान – प्रदान या नशा करते हुए भी पाये जाते हैं, ये परिवर्तन का दौर देखा गया जिससे स्तर ग्राफ निरंतर गिरता गया, ऐसे में फिर क्यों न शिक्षा स्तर की गुणवत्ता की बात हो ?
पर व्यवस्था ही ऐसी परवान चढ़ती जा रही है – जब से शिक्षा का राजनीतिकरण हुआ संस्थागत विद्यालयों की बाढ़ सी आ गयी, सरकारी विद्यालय उपेक्षित होते चले गए, तदुपरांत व्यवसायिक होने से देश भर में स्तर जो गिरा , फिर सम्भलने क नाम नहीं।
देश में आज कुछ राज्यों को छोडकर भले ही लगभग 60-70% आबादी शिक्षित है, जबकि कुछ राज्यों में यह वृद्धि दर शत प्रतिशत तक है, जब कि हमारी पीढ़ी तक लोग सरकारी विद्यालयों की उपज हैं जो अधिकांश नौकरियों या व्यवसाय से जुडे हुए हैं और सच ये भी है कि आज हम सब उन्हीं सरकारी विद्यालयों को कोसते हैं !
कोसना बनता भी है क्योंकि मानसिकता बन चुकी है कि आपके बच्चे सरकारी स्कूल में जाएँ पर हमारे वाले नहीं, हम अपनी सामर्थ्य अनुसार उन्हें विदेशों में, बड़े बोर्डिंग स्कूलों या अच्छे प्राइवेट स्कूलों में पढायेंगें। यही कारण है सभी जनसेवकों व उच्च अधिकारियों के बच्चे विदेशों में पढ़ रहे हैं और जनता के लिए उपदेश सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के आते हैं !
तो कैसे उम्मीद करें कि देश का कोई एक स्कूल या विश्वविद्यालय विश्व के टॉप 500 संस्थान की रैंकिंग में स्थान पाएगा? वे तभी गुणवत्ता के लिए प्रयासरत होंगें जब ऊँचे पदों पर बैठे लोगों की कथनी व करनी में समानता होगी, समाज में कितनी भयावह असमानताएं हैं ? क्या एक ही शिक्षा निति देश को नहीं दी जा सकती? ये काम इतना मुश्किल है ? यदि है तो इस पर काम क्यों नहीं होता? यहाँ तो कोई डिस्क्रिमिनेशन न हो, ऐसा करने पर यह कल के हिंदुस्तान के साथ अन्याय नहीं है , कैसे कोई देश समान शिक्षा निति के बिना तरक्की कर पायेगा, पॉलिसी मेकर्स क्यों ऐसा खिलवाड़ कर रहे हैं ?
जब उनके बच्चे किसी सरकारी विद्यालय में पढ़ने जाएंगे तो अनुमान लगाइये — किसी कलेक्टर का बच्चा सरकारी विद्यालय में जा रहा हो तो शायद अयोग्य शिक्षक….? अलबत्ता वह विधालय जिले की रैंकिंग में पहली पायदान पर होगा या नहीं ? होगा ! शिक्षकों में पोटेंशियल की कमी नहीं , बस चाबी लगाने की आवश्यकता है , चाबी लगाइये तब देखिये कैसे दौड़ते हुए नजर आयेगें।
बिना बजट, अच्छे अध्यापन, उच्च शोध शिक्षा में गुणवत्ता बनाए रखना नामुमकिन है, इसके बिना विश्व गुरु बनने की कल्पना भले ही कर लीजिये, क्यों आज देश के युवा ऑक्सफोर्ड, हावर्ड, स्टेनफोर्ड, बर्कले, केंब्रिज, वाशिंगटन, येल, कोलंबिया, शिकागो, केलिफोर्निया , लंदन , सिंगापुर, पेरिस, स्टॉकहोम आदि विश्विद्यालयों में एडमिशन लेना चाहते हैं, सीधी सी बात अपना भविष्य सुरक्षित करने के लिए, वहाँ की सरकारें शिक्षा नीति संदर्भ में किसी प्रकार का समझौता नहीं करती, निरंतर शिक्षा स्तर में सुधार, शिक्षा को राजनीती से बाहर रखा जाता है, अनुशासन, शोध कार्य , गुणवत्ता बनाये रखने जैसी सुविधाओं पर विशेष ध्यान देती हैं इनका विशाल बजट इन्हें गुणवत्ता बनाये रखने को मजबूर करता है।
जबकि अपने देश में ऐसा कुछ नहीं सबकुछ भगवान के भरोसे छोड़ दिया जाता है, बिल्डिंग हैं नहीं, बिल्डिंग है तो प्रोफेसर नहीं, प्रोफेसर हैं तो सैलेरी , स्टाफ नहीं, बिजली पानी नहीं , अच्छी लाइब्रेरी नहीं , टॉयलेट हैं तो सफाई नहीं, छात्र संघ राजनीती से प्रेरित, पैसा नहीं। फिर कैसे हम अच्छी व गुणवत्ता वाली शिक्षा पाने की अपेक्षा रख सकते हैं।
अभी तक केवल एक ही राज्य सरकार शिक्षा व स्वास्थ्य पर कुल बजट का 25% खर्च करती आई है , इसीलिए वहाँ पर 8 – 10 सालों में बड़ा अमूल चूल परिवर्तन देखने को मिला , सबने देखा है, इसे सराहा भी गया है , अन्यथा सभी सरकारें शिक्षा. स्वास्थ्य पर अपने बजट का 4 से 6% से आगे की सीमा पार नहीं करती। ये खर्च भी यदि ईमानदारी से हो तो कुछ बदलाव दिख सकते हैं !
दूसरों को दोष देना आसान है ऐसा करने से अपनी कमजोरियों को दूसरों के ऊपर डालकर बच निकलने की राह आसान हो जाती है ,
पर्दे के पीछे जो हो रहा है अच्छा है , जो होगा वह भी अच्छा होगा … आप – हम यूँ ही परेशान हो रहे हैं ……..
सब बढ़िया है।